प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। इसमें उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि जनता और राष्ट्र की सेवा करना ही सुशासन का मूल आधार है। उन्होंने कामंदकीय नीतिसार का एक श्लोक पोस्ट किया।
“पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा।
प्रकृतिश्च हिता यस्य स राजा सर्वकामधुक्॥”
श्लोक का भावार्थ क्या है?
इस श्लोक का सरल हिंदी अर्थ है कि जो राजा अपनी प्रजा (जनता) का उचित पालन-पोषण और रक्षा करता है, वही सच्चा सुख प्राप्त करता है। प्रजा की अनदेखी या शोषण करने वाला शासक कभी सुखी नहीं रह सकता। जिस शासक से प्रजा प्रेम करती हो और जिसके राज्य में प्रकृति (पर्यावरण) संतुलित व हितकारी हो, वही राजा सभी कामनाओं को पूरा करने में समर्थ होता है। ऐसा राजा ‘सर्वकामधुक्’ कहलाता है—यानी कामधेनु की तरह प्रजा की हर आकांक्षा पूरी करने वाला।
कहां से लिया गया है यह श्लोक?
यह प्रसिद्ध श्लोक आचार्य कामंदक द्वारा रचित प्राचीन संस्कृत ग्रंथ ‘कामंदकीय नीतिसार’ (या कामंदक नीतिसार) से लिया गया है। इस ग्रंथ में राज्य व्यवस्था, राजा के कर्तव्य (राजधर्म) और सुशासन के सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
सुशासन का मूल मंत्र
प्रधानमंत्री के साझा किए गए इस संदेश में दो बातें खास तौर पर उभरकर आती हैं—
– लोक कल्याण और जन-हित में निःस्वार्थ समर्पण
– पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के साथ संतुलन
आचार्य कामंदक के अनुसार, जब शासक प्रजा के हित में काम करता है तो प्रजा का आशीर्वाद, सहयोग और राष्ट्र की समृद्धि स्वतः ही उसकी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। शांति, खुशहाली और समृद्धि का रास्ता जनसेवा और राष्ट्रसेवा से ही निकलता है। पीएम मोदी के इस पोस्ट ने एक बार फिर प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक शासन व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश को रेखांकित किया है।