'सच्चाई के करीब रहने वाली कहानियां ही दर्शकों से जुड़ती हैं' : मनोज बाजपेयी
Posted on:
2026-06-12
'सच्चाई के करीब रहने वाली कहानियां ही दर्शकों से जुड़ती हैं' : मनोज बाजपेयी
हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओं में शुमार मनोज बाजपेयी ने अपने तीन दशक लंबे करियर में कई यादगार किरदार निभाए हैं। इस बार वह फिल्म \'गवर्नर\' में भारत के पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर एस. वेंकिटरमणन की भूमिका में नजर आएंगे। 12 जून को रिलीज़ होने वाली यह फिल्म 1991 के आर्थिक संकट और उस दौर में लिए गए महत्वपूर्ण फैसलों की कहानी है। फिल्म, किरदार की तैयारी, निर्देशन, इकॉनोमिक्स, अवॉर्ड्स और बॉक्स ऑफिस सहित कई विषयों पर मनोज बाजपेयी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल- एस. वेंकिटरमणन के फैसलों को आप कितना साहसी मानते हैं?
मैं इसे सिर्फ बोल्ड नहीं, बल्कि साहसिक फैसला कहूंगा। उन्हें एहसास हो गया था कि देश जिस स्थिति में पहुंच चुका है, वहां पारंपरिक उपाय कारगर नहीं होंगे। जिस तरह कोई परिवार संकट के समय अपनी जमा पूंजी तक इस्तेमाल करता है, उसी सोच को उन्होंने देश के स्तर पर लागू किया। ऐसे फैसले आसान नहीं होते, लेकिन कई बार परिस्थितियां आपको जोखिम उठाने के लिए मजबूर कर देती हैं।
सवाल- क्या उस समय राजनीतिक समर्थन हासिल करना मुश्किल था?
बिल्कुल। देश का सोना गिरवी रखने जैसा फैसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी था। लोगों और नेताओं, दोनों को इसके लिए तैयार करना आसान नहीं था। हालांकि देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था और अंततः वही फैसला देश को संकट से उबारने में अहम साबित हुआ।
सवाल- किरदार की भाषा और बोलने के अंदाज पर कैसे काम किया?
यह सबसे चुनौतीपूर्ण पहलुओं में से एक था। हमें यह दिखाना था कि वह दक्षिण भारत से आते हैं, लेकिन साथ ही एक शिक्षित और वरिष्ठ नौकरशाह भी हैं। भाषा इतनी अलग नहीं हो सकती थी कि दर्शकों से दूरी बन जाए और इतनी सामान्य भी नहीं कि किरदार की पहचान खत्म हो जाए। उस संतुलन को साधने पर काफी मेहनत की गई।
सवाल- किरदार के लिए और किस तरह की तैयारी करनी पड़ी?
तैयारी एक सतत प्रक्रिया होती है। रिसर्च, बातचीत, वीडियो देखना और पढ़ना लगातार चलता रहता है। मैं इकॉनोमिक्स का छात्र नहीं रहा हूं, इसलिए विषय को समझने में समय देना पड़ा। साथ ही बॉडी लैंग्वेज और मानसिक स्थिति पर भी काम किया, क्योंकि वही किरदार को विश्वसनीय बनाती है।
सवाल- क्या अब भी लगता है कि बहुत से किरदार निभाना बाकी है?
बिल्कुल। सड़क पर चलता हर व्यक्ति मुझे एक संभावित किरदार की तरह दिखाई देता है। हर इंसान की अपनी कहानी है। एक जीवन शायद उन सभी कहानियों को जीने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालांकि संतोष इस बात का है कि मैंने हमेशा अलग-अलग किरदार निभाने की कोशिश की है।
सवाल- निर्देशक चिन्मय मांडलेकर इस परियोजना से कैसे जुड़े?
यह स्क्रिप्ट मुझे कई वर्ष पहले मिली थी। कहानी पसंद आई, लेकिन मन में यह सवाल भी था कि इकॉनोमिक्स जैसे विषय पर फिल्म किस तरह बनाई जाएगी। बाद में मैंने चिन्मय का नाम सुझाया। उन्होंने महीनों रिसर्च की, लेखकों के साथ काम किया और स्क्रिप्ट को बेहतर बनाने में काफी मेहनत की। शुरुआती फुटेज देखने के बाद पूरी टीम का भरोसा और मजबूत हो गया।
सवाल- क्या फिल्मों की जिम्मेदारी है कि वे इतिहास और समाज की कहानियां सामने लाएं?
मैं इसे जिम्मेदारी की बजाय व्यक्तिगत पसंद मानता हूं। मेरा मानना है कि दर्शक हमेशा प्रामाणिक कहानियों से जुड़ते हैं। चाहे वह कॉमेडी हो या गंभीर विषय, अगर उसमें जीवन की सच्चाई है तो लोग उसे महसूस करते हैं।
सवाल- क्या कभी लगता है कि पूरी फिल्म का दबाव आपके कंधों पर है?
मेरा ध्यान हमेशा अपने प्रदर्शन पर रहता है। मैं हर बार यह सोचता हूं कि क्या मैं किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय कर पा रहा हूं। खुद को दोहराने से बचना मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती और दबाव दोनों है।
सवाल- क्या यह फिल्म दर्शकों को इकॉनोमिक्स समझाने में मदद करेगी?
जरूरी नहीं कि दर्शक सभी आर्थिक शब्दावली को समझें, लेकिन वे यह जरूर समझेंगे कि पर्दे के पीछे ऐसे लोग होते हैं जिनके फैसले सीधे आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करते हैं। रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े कई पहलू उन्हीं निर्णयों पर निर्भर करते हैं।
सवाल- 2024 में विदेशों से सोना वापस लाए जाने की घटना को आप कैसे देखते हैं?
सरकारें समय-समय पर ऐसे फैसले लेती रहती हैं। लेकिन इस कहानी का केंद्र वह ऐतिहासिक क्षण है, जब देश को आर्थिक संकट से निकालने के लिए एक व्यक्ति ने बड़ा जोखिम उठाया। उसी फैसले ने आगे चलकर कई बदलावों की नींव रखी।
सवाल- एक अभिनेता-निर्देशक के साथ काम करने का क्या लाभ होता है?
इसका बड़ा फायदा यह है कि वह अभिनेता की चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझता है। चिन्मय खुद अभिनेता हैं, इसलिए उन्हें पता है कि कैमरे के सामने कलाकार किन परिस्थितियों से गुजरता है। उनकी यह समझ काम को आसान बनाती है।
सवाल- \'डिस्पैच\' जैसी फिल्म करने की वजह क्या थी?
क्योंकि वह एक बेहतरीन फिल्म है। मुझे हमेशा ऐसी कहानियां आकर्षित करती हैं जिनमें मजबूत किरदार और दमदार कथानक हो। आखिरकार वही मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।
सवाल- कई अवॉर्ड्स मिलने के बाद क्या दबाव बढ़ जाता है?
अवॉर्ड्स उस शाम तक अच्छे लगते हैं, उसके बाद उनका महत्व पीछे छूट जाता है। शूटिंग के दौरान आपके सामने सिर्फ किरदार होता है। वहां अवॉर्ड नहीं, आपका काम और आपकी तैयारी मायने रखती है।
सवाल- दर्शकों के लिए आपका संदेश?
बॉक्स ऑफिस के आंकड़े मुझे कभी ज्यादा प्रभावित नहीं करते। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कहानी और किरदार पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ दर्शकों तक पहुंचें। अगर फिल्म देखने के बाद दर्शक कुछ महसूस करें और अपने साथ कुछ लेकर जाएं, तो वही सबसे बड़ी सफलता है।